#ये_लोकडाउन2_कैसा_लोकडाउन (विकास बालियान)
पूरे देश में #लोकडाउन2 लागू है।
देश के किसी किसी राज्य ने तो अभी भी #कर्फ्यू भी लगा रखा है।
कोरोना संक्रमित लोगों का आंकड़ा 15000 होने वाला है और मरने वाले लोगों की संख्या भी 500 के करीब पहुंचने वाली है, मतलब मामला तो गंभीर है।
फिर भी आइए चर्चा करें
लोक डाउन का मतलब है प्रशासनिक अमले, चिकित्सा कर्मी, पुलिसकर्मी, सफाई कर्मी, बैंक कर्मी, दूरसंचार कर्मी, विद्युत कर्मी, पालिककर्मी, रेलकर्मी और कुछ आवश्यक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति करने वालों को छोड़ सभी घर में रहे।
घर मे रहने वाले कुछ निश्चित समय देकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अपनी आवश्यकताओं की वस्तुएं प्राप्त बाजार में आकर प्राप्त करें, तो कुछ जगह शुरू शुरू में घर तक ही आपूर्ति भी हुई।
अगर इस लोकडाउन का विश्लेषण करें तो कुछ मजेदार तस्वीर सामने आती है।
हमने हमेशा सुना है कि हिंदुस्तान की 70 फीसदी आबादी गांव में बसती है।
तो बात गांव की करे तो देहात में लोक डाउन के दौरान किसी भी प्रकार से अपने खेत तक आने-जाने कोई भी खेती बाड़ी, पशु कार्य करने की रुकावट नहीं है, ना ही खेत से फसल काटकर मंडी या मिलो तक ले जाने की मनाही है।
सहकारी समितियों से बीज-खाद लेने की भी मनाही नहीं है, अब तो सरकार ने पेस्टिसाइड, इंसेक्टिसाइड, बीज खाद, स्पेयर पार्ट्स, मिस्त्री की दुकान भी खुलवा दी है।
जिनके लिए ग्रामीण व्यक्ति गांव से निकलकर कस्बे, शहर तक जरूरत का सामान ला सकता है।
मतलब एक तरह से हिंदुस्तान की आबादी का 70 फ़ीसदी तबका तो लॉक डाउनलोड फ्री श्रेणी में आ गया। घरसे एक व्यक्ति भी बाहर निकला तो माँ लीजिए पूरा परिवार ही निकल गया, क्योंकि "नॉवेल कोरोना वायरस कोविड19" छूत की बीमारी है।
अब सरकार बैंक में पैसे भी डाल रहे हैं उन्हें लेने के लिए जन धन वाले या जिनके खाते में पैसा आए हैं वह बैंकों के सामने भीड़ लगाए हुए हैं मतलब वह सड़क पर आ सकते हैं।
वहीं सरकार राशन भी दे रही है मतलब राशन लेने वाले गांव शहर में अपने घर से बाहर आकर इकट्ठा हो सकते हैं और यह हिंदुस्तान की भीड़ है, यह सोशल डिस्टेंसिंग का 20 फीसदी भी पालन भी कर दे तो गनीमत है।
वही लोक डाउन में यात्रीहवाई जहाज नहीं चल रहे परंतु मालवाहक कार्गो विमान उड़ रहे हैं। लोक डाउन में पैसेंजर ट्रेन नहीं चल रही मगर माल गाड़ियां चल रही है।
लोक डाउन में बसे, मेट्रो और दूसरे वाहन नहीं चल रहे मगर ट्रक दौड़ रहे हैं।
वही फल-सब्जियां खूब आ जा रही हैं और उन्हें ठेले पर रखकर एक क्षेत्र का व्यक्ति कई किलोमीटर दूर दूसरे क्षेत्र की गली मोहल्ले में पहुंच रहा है।
गली मोहल्लों में तय समय से अलग भी दुकानें खुली हुई मिलती है।
लोक डाउन में भी सुबह 6:00 बजे से सुबह 9:00 बजे तक तमाम लोग बाहर पैदल या बाइक, कार से आ कर सामान खरीद रहे है। मतलब इसे ऐसा समझिए कि जिन लोगो को उनके अलग अलग क्षेत्र के लिए अलग अलग समय मुक़र्रर कर हम कम संख्या में बुला सोशल डिस्टेंशिंग मेंटेन कर सकते है, जिसके लिए हम सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक का समय दे मैनेज कर सकते है वह न करके हम सभी लोगो को 3 घंटे में ही निकल कर आने का मौका दे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन चाह कर भी नहीं कर पा रहे।
वहीं व्यापारियों के दबाव में कहीं किताबों की दुकान, कहीं स्पेयर पार्ट्स की दुकान, कहीं बिजली तो कहीं मिस्त्री की दुकान खुल गई है।
इसके साथ ही मेडिकल स्टोर भी खुले हुए हैं जो लोगों के पास सड़क पर आकर घूमने का अच्छा खासा बहाना है कि वह दवाई लेने के लिए निकला है।
इसके साथ ही बैंक पोस्ट ऑफिस आदि नाम भी लोगों को सड़क पर उतरने का बहाना दे ही रहे है।
अब 11 उद्योग भी खोले जा रहे हैं जहां कर्मचारी, मजदूर ट्रांसपोर्ट से जुड़े सभी लोग आएंगे।
डोमिनोज के साथ अन्य स्टोर को होम डिलीवरी की अनुमति मिल ही गई है उनके लोग भी सड़कों पर निकलने के लिए अधिकृत हो गए हैं।
इसके साथ ही सरकारी कार्यालय भी खुल गए हैं, कुछ 20 से खुल जाएंगे।
जहां 33 फीसदी कर्मचारी प्रतिदिन आएंगे मान लीजिए एक जनपद में 10000 सरकारी कर्मचारी हैं तो 3000 के लगभग प्रतिदिन घर से बाहर आएंगे।
सभी टोल नाके खुल रहे हैं एक टोल नाके पर सैकड़ों लोगों की जरूरत पड़ती ही है वह लोग भी घर से बाहर निकलेंगे।
वही जिन्हें यह दिखाने का शौक रहता है कि वह प्रशासन के करीब है या जिन्हें मीडिया में शक्ल दिखाने का कीटाणु रहता है, वह सफाई कर्मियों, पुलिसकर्मियों, चिकित्सा कर्मियों के गले में इकट्ठा होकर फूल माला डालते हैं या उनके ऊपर और रास्ते मे फूल बिखरते हैं।
अब यह लोग भी इस काम के लिए घर से निकल कर सड़क पर आते ही हैं
इस तरह से अगर देखें तो लगभग 80 फ़ीसदी आबादी एक तरह से लोकडाउन में बाहर निकलने के लिए आजाद सी हो गई है या उस केटेगरी में आ गई है।
तो फिर यह लोकडाउन शायद इन 20 फीसदी लोगो के लिए है जिनमे स्कूली बच्चे, वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, बुद्धिजीवी वर्ग, घरेलू महिला, कॉरपोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोग शामिल है। या कुछ लोग जो 60 वर्ष से अधिक उम्र के है उन के लिए है। इनमें से भी अधिकांश गाहे-बगाहे किसी भी जरूरत का सामान लेने के लिए दिन भर कोई ना कोई बहाना करके बाहर निकल सकते हैं।
"बाइक की सर्विस करानी थी, बैंक में काम था, घर की लाइट काम नहीं कर रही थी, बल्ब लेने आया था, दवाई लेनी थी, बच्चे का कोर्स लेने आया था, कूलर मिस्त्री तक आया था, आदि आदि"
क्योंकि चाहे बैंक हो, चाहे पोस्ट ऑफिस हो, चाहे दूरसंचार से जुड़ी हुई व्यवस्था हो, चाहे विद्युत व्यवस्था हो उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी लोग लगातार अपने कार्यालयों में घर से निकलकर आ ही रहे हैं और इस सब के साथ एक बड़ा तबका वह भी है जिसके पास अनुमति पत्र वाहन का है।
तो फिर इस लोकडाउन की परिधि में कौन-कौन आता है।
कोई तो है जो लाठियां भी झेल रहा, एफआईआर भी झेल रहा
क्यों झेल रहा वो लाठियां, क्या इस कोरोना वायरस की कोई पहचान है कि फला व्यक्ति को है फलां को नहीं है।
आज नौसेना के जहाज आंद्रे पर जो 21 नौसैनिक कोरोनावायरस पॉजिटिव आए, उन्हें तो कोरोनावायरस का एक भी सिम्टम्स नहीं था। ना किसी को बुखार था, ना किसी के गले में खराश थी, ना किसी को खांसी थी, ना किसी को सांस लेने में परेशानी थी।
और सच कहें तो
सच्चा लोकडाउन
मन्दिर, गुरुद्वारे, चर्च
ही निभा रहे
जहां दिन-रात सन्नाटा है बस जब कोई पुजारी, पादरी पूजा करता है तो घंटी की आवाज सन्नाटे को चीर देती है या किसी गुरुद्वारे में जब कोई ग्रंथि अरदास लगाता है तो सन्नाटा खत्म होता है।
तो ये लोकडाउन की कहानी गलत है या सही है
सोचिए जरा सोचिए
(#निठल्ला_चिंतन, #विकास_बालियान)
पिछले 25 दिन से एक कमरे में लोकडाउन का पालन करता कानून को सम्मान देने वाला नागरिक)